Posted by: Alok Pandey | 06/08/2009

कनिष्क

इतिहास हमेशा अपने आप को दुहराता है लेकिन बहुत कम लोगों की आंखे इस बदलाव को देख पाती है और बहुत कम लोग ही इतिहास के बीते पात्र को ढूढने की कोशिश भी करने का प्रयास करते है। भारतीय इतिहास में रुचि रखने वालों के लिए कनिष्क का नाम अच्छी तरह याद होगा। लेकिन मैं यहां भारत सरकार के गृह मंत्रालय में अनुभाग अधिकारी के पद पर कार्यरत कार्यरत श्री जी कनिष्का की बात करने जा रहा हूं। हां बहुत सारे लोग कह सकते हैं कि कोई यह खास उपलब्धि नहीं है। हमारी समस्या यह रही है कि हम सिर्फ बहुत बड़े बड़े नामों के पीछे भागने की कोशिश करते है। हम एक बहुत बड़े बुद्ध , एक बडे गांधी, एक बडे कबीर को हलराते दुलराते है लेकिन एक छोटे छोटे नामों को गौण कर देते है। गांधी जयंती के अवसर पर लाल बहादुर शास्त्री महज एक खानापूर्ति रह जाते है। हम एक बहुत बडे मसीहा की प्रतिक्षा करते हैं शायद इसीलिए धरती पर समस्या है, रक्तपात है, भ्रष्टाचार है। हम छोटे छोटे कई लोगों को मिलाकर एक बड़ा नाम बनाने की कोशिश नहीं करते है।

      हां तो बात हो रही थी कनिष्का की। इतिहास प्रसिद्ध कनिष्का धरती का कई मीलों क्षेत्र जीतना चाहता था जैसे कि अन्य राजाओं और बादशाहओं ने उस समय किया। इतिहास फिर दुहराता है  लेकिन इस बार जिन्दगी के रंगमंच पर हैं जी कनिष्का पर इस समय उनके हाथो में तलवार नहीं है बल्कि है साइकिल। साइकिल के सहारे दुनिया जीतने की कोशिश । है न रोचक। “ यह रास्ता कहां जाता है मैं नहीं जानता पर यह मुझे इस पर चलने की प्रेरणा देता” को वर्षो से जेहन में दबाए हुए छोटे मोटे साहसिक कारनामों में लगे रहे। लेकिन आखिर 2004 में इम्तहान की हद हो गई तो अपने एक दोस्त  के साथ दिल्ली से कन्याकुमारी की 3200 किमी की यात्रा पर अपनी साइकिल के साथ निकल पड़े। उन्होंने यह यात्रा 33 दिनों में पूरी की। एक आम आदमी खासकर दिल्ली जैसे शहरों के लोगों के लिए जो २ किमी की पैदल यात्रा में रिक्शा की बाट देखने लगते है । वे सोच सकते है उनकी इस जीवटता को । लेकिन अभी यह उनके लिए  शुरुआत है। उनका अगला प्रोजक्ट “लेह से इटानगर” के पहाड़ी रास्तों पर साइकिल दौड़ाना। शायद बायरन की कविताओं का हिन्दी कवि बच्चन द्वारा अनुवाद उनके मस्तिष्क में उमड़ता घुमड़ता है।

सघन गहन मनमोहक बनतरु मुझको आज बुलाते हैं।

पर जो किए हैं वादे मैंने याद मुझे वो आते हैं

अभी कहां आराम वदा यह मौन निमंत्रण छलना है

अरे अभी तो मीलों मुझको मीलों मुझको चलना है।

Posted by: Alok Pandey | 06/08/2009

समाजवाद

समाजवाद की थाली में

तुमलोगों ने परोस रखी है पतली दलिया

जरा धीरे धीरे चाटो

सियार बंधुओ

मैं बगुला जो ठहरा।

Posted by: Alok Pandey | 06/08/2009

सी ऑफ ट्रांक्यूलिटी

साम्यवाद की धुन पर तुम मुझे

चमकते चांद पर लाए हो

पर यह तो

सी ऑफ ट्रांक्यूलिटी का हिस्सा है मेरे दोस्त

अरे तुम कहां हो कामरेड

Posted by: Alok Pandey | 30/07/2009

Sea of tranquility

Samyawad ki dhun par

tum mujhe chand par laye

par ye to “sea of tranquility” ka hissa hai 

tum kahan ho commrade

वर्षों से सुन रहा हूं शोर

गांधी को उसने मारा

पर देख रहा हूं इस देश में

चुप होकर बिल्कुल चुप

हर दिन हत्या होते बापू की

और दोष सिर्फ उसके सिर

एक नहीं कई-कई गोडसे हैं यहां

 

हवाला, चारा अलकतरा

घोटाला पर घोटाला

विदेशी पर्यटक के साथ मुंह काला

कभी मधुमिता कभी शिवानी कभी रमानी

ऊफ ये जिन्दगी की कैसी रवानी

कभी लाठी कभी त्रिशुल कभी गड़ासा

ओह यह किसको कैसा झांसा

तंदूर में पकती बेटियां

क्या कम पड़ गयी रोटियां

रणवीर माले नक्सलियों जेहादियों का जंग

कभी मराड कभी गुजरात में लहू बिखरा बन के रंग

विश्वास की पत्नी के संग महीनों बलात्कार

शिल्पी जैन बनी मंत्री के भाई की हवस की शिकार

याद करो उसकी चीत्कार

रोया होगा बापू उस दिन

पीट के छाती अपने हाथ

प्रजातंत्र के प्रहरियों की गुंडागर्दी

समाजवादी ओट में राजसी मस्ती

 

और भी कई हत्यारे

बिजली चोर से लेकर

इन्कम टैक्स चोर तक

कितने कितनों को गिनाऊं

हत्या क्या है समझ न पाऊं

कोई बताए तो हमें

क्या है परिभाषा हत्या की

 

केवल शरीर को मारना क्या

पर क्या यह सच नहीं

कुचले जाते जब किसी के वसूल

तोड़े जाते हैं किसी के सपने

रौंदी जाती है राम-राज्य जैसी अकांक्षाएं

तार तार कर दिए जाते – एक्सपेरीमेंट विथ द ट्रुथ

तब क्या होती नहीं हत्या

सिर्फ शरीर की क्षति है

चर्चा-ए-कत्ल

 

अब तक बापू रहते जिंदा करते आत्महत्या

देखकर अव्यवस्था, हिंसा, भ्रष्टता

स्वयं उनका था कहना

-         माफ करना दोस्तों

घृणा, हिंसा के मध्य ,

मैं जिंदा रहना नहीं चाहता

Posted by: Alok Pandey | 24/04/2009

resham resham tu resham resham

Resham resham tu resham resham

resham resham hai ye hawayen

 resham resham hai ye fijayen

resham si bahen teri

resham si  julfe teri

 lo bandh gaya mai is resham mein

yado ke mausam mein

resham resham tu  resham  resham

resham ke tan mein tere resham ka man hai yara

dekha tujhe to laga resham hai jag ye sara

 jeevan ki tanhai mein, dur bajti shahnai mein

 phulo ki birwayi mein, apni parchhai mein

ek ehasas hai naram, resham resham

 resham resham tu  resham resham

jalte badan pe  tu chandan ki lep lage

 kheto  se aati hui ann ki pahli khep lage

ek reshami  aawas hai ek reshami vishwas hai

bachna na chauhu jisase aisi tu faans hai

sapno mein aate rahna ban  reshmi bharam

resham resham tu resham resham

 

 

Posted by: Alok Pandey | 30/03/2009

प्यार.

मैंने तुम्हें ख्वाब में बसाया था
और खुद को मैंने तुझमें छुपाया था
तुम हो कि ख्वाब तोड़ के आ गए
धरा पर छोड़ मुझे
आसमां पर छा गए
और तुम हो कि पूछते हो इक सवाल
क्यों करते हो मुझसे प्यार
मैं मोती हूँ
आ बन सीप तुम मुझको छुपा लो
और ख्वाब के समंदर में
फिर से एक बार नहल! (nahla) दो .

Posted by: Alok Pandey | 30/03/2009

ख्वाब

तुझको छुपा लाता मैं रक्त में
सेंध गर लग।ता कभी वक्त में ।

Posted by: Alok Pandey | 24/12/2008

छली

हार जाते हर जनम हम खेल में

ओ छली तेरा शकुनिया दांव है

चलते चलते थक गया हर पांव है

और कितनी दूर तेरा गांव हैं

          (बशीर अहमद मयूख, कोटा)

                    

Posted by: Alok Pandey | 24/12/2008

दाड़िम

नाक का मोती अधर की कांति से

बीज दाड़िम का समझकर भ्रांति से

देख शुक सोच रहा है, होकर मौन है

अरे यह दूसरा शुक कौन है

 

              (साकेत: मैथिलीशुरण गुप्त)

 

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